सोमवार, 14 जुलाई 2014

प्रेम दान

एक आदमी रास्ते से गुजर रहा है और एक भिखमंगे ने उसके सामने हाथ फैलाया। 

उस आदमी ने अपनी जेबें तलाशी। संयोगवश कुछ था नही उसके पास।

उसने भिखमंगे के हाथ में अपना हाथ रख दिया और कहा: भाई! मुझे क्षमा कर। अभी मेरे पास कुछ भी नहीं। कल जब आऊंगा तो जरूर कुछ लेकर आऊंगा।
उस भिखमंगे की आंखें गीली हो गयी। उसने कहा अब लाने की कोई जरूरत नहीं; जो देना था, तुमने दे दिया।

तुमने मेरे हाथ में हाथ रखा। ऐसा करनेवाले तुम पहले आदमी हो। तुमने मुझे भाई कहा; तुम मेरे पहले दाता हो। अब और कुछ की जरूरत नहीं।

बस, मेरे पास दो घड़ी बैठ जाओ। यह हाथ मेरे हाथ में रहने दो। यह पहला हाथ है, जो मेरे हाथ में आया। धन देने वाले तो बहुत मिले हैं, प्रेम देने वाला कोई भी नहीं मिला। और भाई तो मुझे किसी ने कहा ही नहीं। यह शब्द कितना प्यारा है!

वह भिखमंगा कहने लगा—इसमे कितना मधुरस है! तुमने मुझे सब दे दिया। कभी यहां से गुजरो, तो मेरे हाथ में हाथ देकर क्षण भर बैठ जाया करे। फिर कभी मुझे भाई कहकर पुकारना।

तुम्हारे पास कुछ हो ना हो! किसी को भाई कहकर तो पुकार सकते हो। 


इतने कृपण तो मत हो जाओ कि किसी को प्रेम देना भी कठिन हो जाये! भाई कहना भी मुश्किल हो जाए!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें